उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) में विश्व अस्थमा दिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा विशेषज्ञों ने अस्थमा के प्रबंधन और उपचार के आधुनिक तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का मुख्य संदेश यह था कि अस्थमा के रोगियों के लिए इनहेलर थेरेपी एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है। डॉक्टरों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मरीजों को इस बीमारी से उतना खतरा नहीं है, जितना कि समाज में फैली इसके इलाज से जुड़ी भ्रांतियों से है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोगी सही उपचार पद्धति अपनाएं और नियमित रूप से डॉक्टरी सलाह का पालन करें, तो वे एक सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।
इनहेलर और साक्ष्य-आधारित उपचार की आवश्यकता
संस्थान के श्वसन रोग विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) अजय कुमार वर्मा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इनहेलर और साक्ष्य-आधारित उपचार (एविडेंस-बेस्ड ट्रीटमेंट) की महत्ता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि अस्थमा के प्रबंधन में इनहेलर सबसे प्रभावी माध्यम है। इसके सही और समय पर उपयोग से न केवल अस्थमा के कारण होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सकता है, बल्कि इस बीमारी से होने वाली मृत्यु दर में भी प्रभावी रूप से कमी लाई जा सकती है। उन्होंने मरीजों को सलाह दी कि वे बिना किसी डर के आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाएं ताकि बीमारी को नियंत्रित रखा जा सके।
संस्थान में शुरू होगा नया डीएम पाठ्यक्रम
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संस्थान के निदेशक प्रो. सीएम सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने संस्थान की भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी देते हुए एक महत्वपूर्ण घोषणा की। प्रो. सिंह ने बताया कि डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में बहुत जल्द पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के अंतर्गत 'डीएम' (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) पाठ्यक्रम की शुरुआत की जाएगी। इस कदम से न केवल संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता में वृद्धि होगी, बल्कि श्वसन रोगों के क्षेत्र में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नई पीढ़ी तैयार हो सकेगी, जिससे अंततः मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त होंगी।
गंभीर अस्थमा और आधुनिक उपचार पद्धतियां
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) आलोक नाथ और पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) वेद प्रकाश ने गंभीर अस्थमा के आधुनिक उपचारों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ अब अस्थमा के उन मरीजों का भी प्रभावी इलाज संभव है जो गंभीर स्थिति में पहुंच चुके हैं। आधुनिक दवाओं और तकनीकों के माध्यम से फेफड़ों की कार्यक्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है। पल्मोनरी विशेषज्ञ डॉ. मृत्युंजय सिंह ने इस दौरान अस्थमा से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई लोग यह समझते हैं कि एक बार इनहेलर शुरू करने पर इसकी लत लग जाती है, जबकि वास्तविकता यह है कि इनहेलर कोई लत नहीं बल्कि मरीज की जरूरत है।
क्यों प्रभावी है इनहेलर तकनीक?
चिकित्सकों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया कि अस्थमा के इलाज में इनहेलर गोलियों की तुलना में अधिक प्रभावी क्यों है। इसके पीछे के मुख्य कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- सीधा असर: इनहेलर एक छोटा और सुलभ उपकरण है जो दवा को सीधे मरीज के फेफड़ों तक पहुंचाता है, जिससे तत्काल राहत मिलती है।
- कम खुराक: चूंकि दवा सीधे प्रभावित अंग (फेफड़ों) तक पहुंचती है, इसलिए दवा की बहुत कम मात्रा की आवश्यकता होती है।
- न्यूनतम दुष्प्रभाव: खाने वाली गोलियां पहले पेट में जाती हैं और फिर रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैलती हैं, जिससे अन्य अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है। इसके विपरीत, इनहेलर का असर केवल फेफड़ों तक सीमित रहता है